राजनैतिक दबबे की हनक में न्यायालय की अवमानना से बाज न आने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचन्द शर्मा के विरूद्ध अधिवक्ता अधिनियम 1961 के अन्तर्गत कड़ी कार्यवाही की संस्तुति
राजनैतिक दबबे की हनक में न्यायालय की अवमानना से बाज न आने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचन्द शर्मा के विरूद्ध अधिवक्ता अधिनियम 1961 के अन्तर्गत कड़ी कार्यवाही की संस्तुति

कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट देहरादून के न्यायालय में वादों की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा द्वारा बार-बार अनुशासनहीन एवं अमर्यादित आचरण किए जाने का मामला संज्ञान में आया है। बीते 25 मार्च .2026 को विभिन्न वादों की सुनवाई के दौरान संबंधित अधिवक्ता द्वारा न्यायालय की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करते हुए पीठासीन अधिकारी एवं न्यायालय के प्रति आपत्तिजनक एवं असम्मानजनक टिप्पणियाँ की गईं। इस प्रकार का व्यवहार न्यायालय की गरिमा एवं विधिक प्रक्रिया के प्रतिकूल है। एक वरिष्ठ अधिवक्ता से अपेक्षित शिष्टाचार एवं अनुशासन का पालन न किया जाना गंभीर पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आता है। अधिवक्ता प्रेमचन्द शर्मा गहरी राजनैतिक पैठ रखते हैं, अपने राजनैतिक सम्बन्धों के चलते वे न्यायालय के गरिमा भंग करने से नही चूकते है। इसी आदत के चलते वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय में सुनवाई के दौरान पठासीन अधिकारी से अभद्रता करते हुए न्यायालय की गरिमा को ठेस पंहुचाई। इस प्रकार के अनुचित व्यवहार पर प्रथमबार किसी अधिवक्ता के विरूद्ध कार्यवाही की संस्तुति की गई है।
पीठासनी अधिकारी के विरूद्ध अपमानजनक शब्दों का प्रयोग व न्यायालय की अवमानना को गंभीरता से लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट देहरादून सविन बसंल द्वारा अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा के विरुद्ध अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु उत्तराखण्ड विधिज्ञ परिषद् को संस्तुति प्रेषित की गई है। साथ ही, प्रकरण को अनुशासन समिति (Disciplinary Committee) को संदर्भित करने एवं जांच अवधि के दौरान अधिवक्ता के प्रैक्टिस अधिकारों के निलंबन पर विचार करने का अनुरोध किया गया है।
*जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर न्यायालय, देहरादून में न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाने, न्यायालय की अवमानना करने, अदालती कार्यवाही के दौरान अभद्र आचरण करने तथा आधारहीन आरोप लगाने के गंभीर प्रकरण में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचन्द्र शर्मा के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु संस्तुति की गई है। उक्त प्रकरण में अधिवक्ता को Professional Misconduct का दोषी मानते हुए जिला न्यायालय, देहरादून द्वारा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत उनका वकालती लाइसेंस निरस्त किए जाने हेतु उत्तराखण्ड राज्य बार काउंसिल एवं बार काउंसिल ऑफ इंडिया को औपचारिक संस्तुति प्रेषित की गई है। उल्लेखनीय है कि संबंधित अधिवक्ता पूर्व में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासूका), 1980 के अंतर्गत निरुद्ध रह चुके हैं तथा न्यायालय में कई अवसरों पर चिल्लम-चिल्ली, अभद्र व्यवहार एवं न्यायालय तथा सहकर्मियों पर अनुचित दबाव बनाने के प्रयास भी कर चुके हैं। यह भी संज्ञान में आया है कि न्यायालय की कार्यवाही के दौरान लगातार अनुशासनहीनता एवं अवमाननापूर्ण व्यवहार किया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई एवं न्यायालय की गरिमा को आघात पहुँचा। इन सभी तथ्यों के आधार पर यह कठोर संस्तुति की गई है। विशेष रूप से यह भी उल्लेखनीय है कि यह प्रकरण राज्य में प्रथम अवसर है जब किसी अधिवक्ता के लाइसेंस निरस्तीकरण हेतु इस प्रकार की संस्तुति राज्य एवं राष्ट्रीय बार काउंसिल को प्रेषित की गई है। जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा स्पष्ट संदेश दिया गया है कि न्यायालय की अवमानना,अनुशासनहीनता एवं न्यायिक गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध सख्त कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी। न्यायालय की मर्यादा एवं विधि व्यवस्था से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा हाल ही में निदेशक शिक्षा संग खून खराबा व हुड़दंग मचाने वाले विधायक उमेश शर्मा ‘काऊ’ के सगे भाई हैं वरिष्ठ अधिवक्ता, जिन पर संगीन धाराओं में आपराधिक मुकदमा गतिमान है।
ज्ञातब्य है कि वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचन्द शर्मा बारम्बार न्यायालय में अभद्र आचरण करने की उनकी प्रवृत्ति बन चुकी है, उनका आचरण प्रज्ञावान अधिवक्ता के शील के प्रतिकूल है तथा उनका व्यवहार न्यायालय के प्रति असम्मानजनक रहा है। अधिवक्ता ने न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के साथ अगरिमामय आचरण व अभद्रता से पेश आते है और न्यायिक कार्यवाही में अनावश्यक बाधा उत्पन्न करते हुए पीठासीन अधिकारी व न्यायालय के कर्मचारियों के विरूद्ध अपमानजनक व आधारहीन आरोप लगाते है व गम्भीर कदाचार के दोषी है। उनका व्यवहार निरंतर और गम्भीर रूप से अनुचित है। वरिष्ठ अधिवक्ता न्यायालय का अधिकारी होता है और उससे उच्चतम स्तर की मर्यादा अपेक्षित होती है। न्यायालय में ऐसी अनुशासनहीनता कदाचित स्वीकार्य नहीं हो सकती है। न्यायालय में निरंतर अभद्र, आवेशित व न्यायालय की गरिमा के विपरीत आचरण करना तथा पीठासीन अधिकारी का अपमान व न्यायालय में निरन्तर अमर्यादित, आक्रोशित व्यवहार गम्भीर पेशेवर कदाचार है।
ज्ञातब्य है कि वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा ने जिला मजिस्ट्रेट देहरादून के न्यायालय में पेशी के दौरान अत्यन्त अभद्र व असम्मानजनक व्यवहार किया है उन्होंने न्यायालय व पीठासीन अधिकारी के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया व न्यायालय की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न की है। इनका यह आचरण न केवल न्यायालय की गरिमा के विपरित है, अपितु अधिवक्ता के कर्तव्यों व आचार संहिता का गम्भीर उल्लंघन किया है। प्रेमचंद शर्मा द्वारा पूर्व में भी कई बार इस प्रकार का आचरण किया जा चुका है। निरन्तर उनका ऐसा व्यवहार अनुशासनहीन एवं आपत्तिजनक होने के साथ-साथ Professional Misconduct की श्रेणी में आता है, जिसके लिये Advocate Act 1961 के अन्तर्गत कार्यवाही की संस्तुति की गई है।
